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भरत सिंह चौधरीः ग्राम प्रधान से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का सफर

उत्तराखंड, 21मार्च 2026

रूद्रप्रयाग के विधायक भरत सिंह चौधरी के कदम सियासत में कभी भी थमे नहीं। इसी के चलते वे प्रधान से सियासी पारी की शुरूआत कर आज उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री के ओहदे पर काबिज हो गए है। कहा जा सकता है कि सियासत में हार और जीत उनका पीछा करती रही। इसके बावजूद उन्होंने डगर नहीं छोड़ी।

रूद्रप्रयाग जनपद के हरियाली क्षेत्र के क्वांरी-चमकोट के मूल निवासी भरत चौधरी ने घोलतीर नगरासू में काफी पहले ही बसागत कर दी थी। इसके चलते 80 के दशक में मवाणा के प्रधान पद पर निर्वाचित होते हुए उन्होंने कर्णप्रयाग के ब्लॉक प्रमुख पद के लिए दावेदारी जताई। तत्कालीन कांग्रेस सांसद चंद्रमोहन सिंह नेगी ने उन्हें कर्णप्रयाग के ब्लॉक प्रमुख पद का उम्मीदवार बना दिया। इस चुनाव में चौधरी दिवंगत डिप्टी स्पीकर डा. अनसूया प्रसाद मैखुरी से प्रमुख का चुनाव हार गए थे। इसके बाद भी उन्होंने सियासत की डगर नहीं छोड़ी। 1989 में कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव जनता दल के टिकट पर लड़ा किंतु भाग्य ने साथ नहीं दिया। इस तरह वह लगातार विधानसभा का चुनाव लड़ते रहे। उत्तराखंड राज्य बना तो 2002 में उन्होंने रूद्रप्रयाग के बजाय कर्णप्रयाग से चुनाव लड़ने का फैसला किया। कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया। सतपाल महाराज ने टिकट वितरण पर विरोध कर मोर्चा खोला। कांग्रेस हाईकमान ने अंततः भरत चौधरी समेत आठ दिग्गजों के घोषित टिकट वापस ले लिए। चौधरी को भी कर्णप्रयाग से टिकट दे दिया गया। यहां भी चौधरी को जीत नसीब नहीं हो पाई। यह सिलसिला आगे भी चलता रहा किंतु चौधरी अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाए। इसके बाद उन्होंने रूद्रप्रयाग से चुनाव लड़ते रहे। 2015 में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी का दामन थामा। इसके चलते 2017 में चौधरी को भाजपा ने रूद्रप्रयाग से चुनाव मैदान में उतार लिया। चुनाव जीत कर वे विधानसभा की दहलीज तक पहुंच गए। 2022 में भी चौधरी चुनाव जीतने में सफल रहे। कहा जाता है कि विधानसभा के पांच चुनाव हारने के बाद भी चौधरी ने हार नहीं मानी और पिछले दो चुनावों से वह जीत का परचम लहरा रहे हैं।

शुक्रवार को उत्तराखंड मंत्रीमंडल का का विस्तार हुआ तो चौधरी कैबिनेट मंत्री का ओहदा हासिल करने में सफल हो गए। इस तरह प्रधानी से सियासत की शुरूआत करने वाले चौधरी इस बार काबीना मंत्री बनने में सफल हुए हैं। कहा जा सकता है दृढ़ इच्छा शक्ति और मिशन को लेकर सियासत करने वाले भरत सिंह को आखिरकार मंजिल मिल ही गई। पत्नी भुवना चौधरी भी एक बार जिला पंचायत सदस्य के ओहदे पर काबिज रही हैं। चमोली तथा रूद्रप्रयाग में चौधरी का सियासी दखल किसी से छिपा नहीं है। कहा जा सकता है कि रूद्रप्रयाग से अधिक चमोली जिले में उनकी सियासी पहचान अभी तक भी बनी है। तार्किक क्षमता के धनी भरत सिंह ने कभी भी अपनों को छोड़ने की फितरत नहीं रही। मौजूदा दौर में रूद्रप्रयाग जनपद में सियासत के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हो गए हैं। इस बार माना जा रहा था कि केदारनाथ की विधायक आशा नौटियाल तथा कर्णप्रयाग के विधायक अनिल नौटियाल भाजपा के टिकट पर तीसरी बार पारी खेलने के चलते उन्हें भी मंत्रीमंडल में जगह मिल जाएगी किंतु ऐसा हो नहीं पाया।

चौधरी के पिता छौंदाण सिंह एक दौर में सुबेदार के पद पर रहे। सैन्य पृष्ठभूमि के भरत सिंह मौजूदा दौर में भाजपा की सियासत के खेवनहार बन गए हैं। सियासत में उन्होंने वामपंथ को छोड़कर ऐसा कोई दल नहीं रहा जिसमें उनकी मौजूदगी न रही हो। अंततः भाजपा के साथ जुड़ने पर ही उन्हें कामयाबी हासिल हो पाई है।

मंत्रीमंडल विस्तार में गढ़वाल का दबदबा

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मंत्रीमंडल में कुमाऊं की अपेक्षा गढ़वाल का दबदबा दिखाई दे रहा है। मंत्रीमंडल विस्तार के बाद 12 सदस्यीय मंत्रीमंडल में गढ़वाल क्षेत्र से आठ मंत्री हो गए हैं। हालांकि इससे पूर्व भी मंत्रीमंडल में गढ़वाल का दबदबा था। इससे पूर्व के मंत्रीमंडल में सतपाल महाराज, डा. धनसिंह रावत, गणेश जोशी तथा सुबोध उनियाल गढ़वाल क्षेत्र से ही हैं। गढ़वाल क्षेत्र के ही प्रेमचंद्र अग्रवाल को पिछले साल विवादित बयानों के चलते इस्तीफा देना पड़ा था। नये विस्तार में भी मुख्यमंत्री ने पांच में से चार मंत्री गढ़वाल से ही बनाए है। इनमें भरत सिंह चौधरी, खजान दास, मदन कौशिक तथा प्रदीप बत्रा शामिल है। इस विस्तार में कुमाऊं में सिर्फ राम सिंह कैडा को स्थान मिला है। इस तरह कहा जा सकता है कि 12 सदस्यीय मंत्रीमंडल में सीएम समेत चार ही मंत्री है। इनमें सीएम पुष्कर सिंह धामी, सौरभ बहुगुणा, रेखा आर्या तथा राम सिंह कैड़ा शामिल हैं। जातीय तौर पर देखा जाए तो समूचे मंत्रीमंडल में ब्राह्मण मंत्रियों की संख्या चार, ठाकूरों की पांच, दलितों की दो और एक मंत्री पंजाबी समुदाय हैं। मैदान और पहाड़ की बात करें तो मैदान क्षेत्र से पांच और पहाड़ी क्षेत्रों से सात मंत्रियों को कैबिनेट में जगह मिली है। कहा जा सकता है कि मंत्रीमंडल का गठन बेहद संतुलित तो है ही अपितु इसमें गढ़वाल की उपेक्षा भी नहीं झलकती है। अब देखना यह है कि पुराने और नए मंत्री किस तरह 2027 में भाजपा के खेवनहार बनते हैं। यह सब भविष्य में देखने को मिलेगा।

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